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वेंटिलेटर के इस्तेमाल पर डॉक्टर्स की अलग-अलग राय, जानें क्या कहते हैं दुनियाभर के डॉक्टर

न्यूयॉर्क शहर के एक डॉक्टर कैमरॉन सिडेल की वीडियो से पूरे स्वास्थ्य विभाग में तहलका मच गया है। दो हफ्ते पहले उस वीडियो में यह जानकारी दी गई कि वेंटिलेटर कोरोना मरीज की मदद करने से ज्यादा उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि हम एक अवास्तविक स्वास्थ्य नमूने का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि गलत तरीके से इलाज करने पर बहुत कम समय में बहुत ज्यादा लोगों को इसकी भरपाई करनी पड़ेगी। कुछ हफ्तों के बाद ही स्वास्थ्य विभाग दो गुटों में बंट गए। कुछ डॉक्टर वेंटिलेटर के इस्तेमाल से दूर जाने लगे और कुछ वेंटिलेटर के इस्तेमाल की वकालत करने लगे। हालांकि एक बात साफ थी कि वेंटिलेटर पर जी रहे कोरोना वायरस के मरीज डॉक्टर्स की उम्मीद पर नहीं खरे उतर रहे थे। मैकेनिकल वेंटिलेटर में थोड़ा जोखिम होता है। जब कोरोना मरीज के फेफड़े शरीर को ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाते हैं तो वेंटिलेटर के जरिए ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है। मैकेनिकल वेंटिलेटर में एक ट्यूब के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। यह ऑक्सीजन देने का काफी आक्रामक रूप है, जिसे डॉक्टर अंत के लिए छोड़ देते हैं। हालांकि ऐसे कोरोना मरीजों की संख्या बहुत कम है जिन्हें वेंटिलेटर की जरूरत होती है। चीन और न्यूयॉर्क से मिल डाटा के मुताबिक जितने भी मरीजों को ठीक करने के लिए वेंटिलेटर का इस्तेमाल किया जाता है उनमें से 80 फीसद मरीज भी ठीक नहीं हो पाते। डॉ कैमरॉन सिडेल कहते हैं कि यह संख्या काफी ज्यादा है। डॉक्टर्स एक्यूट रैस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम जैसी स्थिति होने पर भी मरीज को वेंटिलेटर पर डाल देते हैं। यूरोपियन फिजिशियन के एक समूह ने अमेरिकन जर्नल ऑफ रैस्पिरेट्री एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि एक्यूट रैस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम कोविड-19 से अलग है। पत्र में डॉक्टर्स को सलाह दी गई कि ज्यादा गंभीर हालत में ही वेंटिलेटर का इस्तेमाल किया जाए। कुछ डॉक्टर का कहना है कि मैकेनिकल वेंटिलेटर मददगार होते हैं लेकिन कई डॉक्टर बहुत जल्द इसका इस्तेमाल कर लेते हैं। जबकि वेंटिलेटर की जगह सांस लेने में मदद करने वाला मास्क और नसल ट्यूब का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अमेरिकन लंग्स एसोसिएशन के प्रवक्ता डॉ डेविड हिल का कहना है कि वेंटिलेटर कोरोना वायरस का उपयुक्त इलाज नहीं है। कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या काफी ज्यादा है, जहां अच्छा परीक्षण है वहां सप्लाई कम है और वेंटिलेशन का इस्तेमाल करना बहुत मुश्किल है। अगर हर मरीज के लिए फेफड़ों का विशेष डॉक्टर उपलब्ध करा दिए जाए तो परिणाम ज्यादा बेहतर आएंगे। ऐसा करने पर वेंटिलेटर का इस्तेमाल जरूरतमंद मरीज के लिए हो जाएगा और कम गंभीर वाले मरीजों के लिए कोई और विकल्प उपलब्ध हो जाएगा। लेकिन कई अस्पताल ऐसे हैं जो आखिरी विकल्प को पहले इस्तेमाल करते हैं। कुछ डॉक्टर का कहना है कि कोरोना मरीज को कभी भी वेंटिलेटर की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। डॉ निकोलस हिल का कहना है कि वह वेंटिलेटर का इस्तेमाल कम करते हैं और कुछ कम आक्रामक उपकरणों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। डॉ हिल ने कहा कि वेंटिलेटर की जरूरत उन्हें पड़ती है जो ज्यादा बुजुर्ग और बीमार होते हैं। डॉ निकोलस हिल कहते हैं कि कोरोना के मरीज और एक्यूट रैस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम वाले मरीज का अलग व्यवहार होता है। एक्यूट रैस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम जैसी बीमारी में फेफड़ सख्त हो जाते हैं इसलिए ऐसे मरीजों को वेंटिलेशन की जरूरत होती है लेकिन ऐसा कोरोना के सभी मरीजों के साथ नहीं होता। कोलोरेडो के डॉ केन लीन-क्यू का मानना है कि कोरोना वायरस और एक्यूट रैस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम में कुछ तो अंतर है लेकिन जिन कोरोना मरीजों का उन्होंने इलाज किया है उनमें अलग लक्षण मिले हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमित मरीज में एक्यूट रैस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम के साथ साथ कुछ और दिक्कतें होती हैं। डॉ केन लीन-क्यू का कहना है कि सभी डॉक्टर शायद बेहतर कर सकते थे लेकिन डाटा के कमी और बीमारी के वैक्सीन ना मिलने तक वही किया जा सकता है जो गाइडलाइंस और 25 साल का अनुभव कहता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 18, 2020, 16:31 IST
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