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कोरोना के एंटीबॉडी टेस्ट और पीसीआर टेस्ट में क्या है अंतर, एक हफ्ते में होंगे 42 हजार टेस्ट

कोरोना वायरस की जांच में दो टेस्ट का नाम सबसे ज्यादा लिया जा रहा है- रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट और पीसीआर टेस्ट। इनमें सबसे बड़ा फर्क यह है कि जब किसी व्यक्ति को कोई बीमारी होती है, तो शरीर उससे लड़ने के लिए शरीर में एंटीबॉडी बना लेता है। इस तरह रक्त में संबंधित एंटीबॉडी मिलने से व्यक्ति के उस बीमारी से संक्रमित होने का संकेत मिलता है। लेकिन यह अन्य बीमारियों के कारण भी हो सकता है। इसीलिये इस चरण में संक्रमण होने की आशंका वाले व्यक्ति का पीसीआर टेस्ट किया जाता है। यह डीएनए पर आधारित विश्लेषण कर कोरोना की पुष्टि करता है, जिसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं बचती। इसे अंतिम और प्रामाणिक माना जाता है। लक्षण अगर किसी व्यक्ति को दमा जैसी बीमारी नहीं है और इसके बाद भी उसे सांस लेने में परेशानी का अनुभव हो रहा है, तो उसे कोरोना संक्रमण की आशंका हो सकती है। इसके अलावा अगर व्यक्ति को बुखार हो रहा है,सर्दी हो रही है या गले और फेफड़े में दर्द का अनुभव हो रहा है, तो भी उसे कोरोना संक्रमण होने की आशंका हो सकती है। ऐसे व्यक्ति को तत्काल डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। लेकिन इस चरण में व्यक्ति को बिल्कुल घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि यह अन्य कारणों से भी हो सकता है। कोरोना की जांच में निम्न चरण शामिल होते हैं-कोरोना से संबंधित एक या अधिक लक्षण पाए जाने पर व्यक्ति की निम्न स्तरों पर जांच कर संक्रमण की पुष्टि की जाती है- स्वैब टेस्ट- इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च(ICMR)के मुताबिक जिस व्यक्ति में कोरोना संक्रमण की आशंका होती है, उसके गले या नाक के अंदर से कॉटन के जरिए सैंपल लेकर उसकी जांच की जाती है। सैंपल गले या नाक से इसलिए लिया जाता है क्योंकि कोरोना का वायरस इन्हीं जगहों पर सबसे ज्यादा सक्रिय होता है। ICMR के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर रमन आर गंगाखेड़कर के मुताबिकसैंपल को एक विशेष रसायन में डाला जाता है, जिसमें कोशिकाएं वायरस से अलग हो जाती हैं। व्यक्ति को किसी दूसरी बीमारी का संक्रमण हो सकता है। यही कारण है कि इस स्तर पर मिले वायरस का कोरोना वायरस के लक्षणों का मिलान किया जाता है। अगर मिले वायरस कोरोना वायरस के लक्षण वाले हुए तब व्यक्ति को कोरोना होने की पुष्टि हो जाती है। नेजल एस्पिरेट-नाक में एक विशेष रसायन डालकर सैंपल एकत्र कर उसकी जांच की जाती है। ट्रेशल एस्पिरेट-अब तक के अनुभव से स्पष्ट हुआ है कि कोरोना पॉजिटिव लोगों में फेफड़े में सबसे ज्यादा तकलीफ होती है। ट्रेशल एस्पिरेट टेस्ट में व्यक्ति के फेफड़ों तक ब्रोंकोस्कोप नाम की एक पतली ट्यूब डाली जाती है। ट्यूब के जरिए सैंपल एकत्र कर उसमें संक्रमण की स्थिति का पता लगाया जाता है। सप्टम टेस्ट-फेफड़े या नाक से लिए गए सैंपल का टेस्ट सप्टम टेस्ट के रूप में जाना जाता है। ब्लड टेस्ट-संक्रमित व्यक्ति के रक्त की भी जांच की जाती है और उसमें ऑक्सीजन की मात्रा इत्यादि की चेकिंग की जाती है। दिल्ली को मिले42हजार टेस्ट किट्स दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा है कि राजधानी को42हजार रैपिड एंटीबॉडी टेस्टिंग किट्स मिल चुके हैं। अगले एक हफ्ते के दौरान दिल्ली में42हजार टेस्ट किए जाएंगे। स्वास्थ्यकर्मियों को रविवार को एलएनजेपी अस्पताल में इसकी ट्रेनिंग दी जा रही है। इसकी शुरुआत हॉटस्पॉट एरिया से की जाएगी। लेकिन रैंडम किसी का भी टेस्ट नहीं किया जाएगा,बल्कि जिसके अंदर किसी तरह का कोरोना संक्रमण का लक्षण मिलेगा,उसी को टेस्ट के लिए चुना जाएगा। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट कोरोना के लिए अंतिम नहीं माना जाता है। यह केवल संक्रमण के बाद एंटीबॉडी बनने का लक्षण होता है। अगर कोई व्यक्ति इस स्तर पर संक्रमित पाया जाता है तो पीसीआर टेस्ट कर उसके संक्रमण की सही स्थिति पता की जाएगी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि रैपिड टेस्टिंग आवश्यक एरिया में ही की जाएगी और इन टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए लोगों की अन्य तरीकों से भी जांच कर संक्रमण की पुष्टि की जाएगी। पीसीआर टेस्ट पॉलीमरेज चेन रिएक्शन या पीसीआर टेस्ट कोरोना की टेस्टिंग का महत्वपूर्ण आयाम है। पॉलीमर वे एंजाइम होते हैं जो डीएनए की नकल बनाते हैं। इसमें कोरोना संक्रमित व्यक्ति के स्वैब सैंपल से डीएनए की नकल तैयार कर संक्रमण की जांच की जाती है। इसकी जांच वायरस के डीएनए से किया जाता है। अगर मिलान सही मिलता है तो व्यक्ति में कोरोना की पुष्टि हो जाती है। लेकिन यह बहुत अत्याधुनिक लैब में ही किया जा सकता है। पीसीआर टेस्ट में चार से छह घंटे का समय लग सकता है। रैपिड टेस्टिंग किट कोरोना की जांच में टेस्टिंग किट्स की कमी देश के लिए बड़ी चिंता की वजह बन गई थी। लेकिन गुरुग्राम की एक कंपनी एचएलएल लाइफकेयर ने अपने मानेसर स्थित प्लांट में रैपिड टेस्टिंग किट बनाने का दावा किया है और इसे आईसीएमआर की तरफ से मंजूरी भी मिल गई है। यह किट केवल खून या थूक के सैंपल से ही कोरोना जांच में सक्षम बताई गई है। केंद्र सरकार ने चीन से6.50लाख कोरोना जांच किट की मांग की थी, जिसे चीन ने भारत को सौंप दिया है। ये किट्स देश के अलग-अलग राज्यों में भेजी भी जा रही हैं। इससे अब कोरोना की बड़े स्तर पर टेस्टिंग की जा सकेगी और संक्रमण की ज्यादा स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी। उपचार की प्लाज्मा विधि वहीं पूरी दुनिया में कोरोना के इलाज के लिए अब प्लाज्मा विधि का भी उपयोग किया जा रहा है। दरअसल,कोरोना पॉजिटिव व्यक्ति जब ठीक हो जाता है तो इस रोग से लड़ने के लिए उसके रक्त में प्रतिरोधी तत्व पैदा हो जाते हैं। भारत में केरल में सबसे पहले इस विधि से इलाज किया गया था, जिसके बेहद अच्छे परिणाम मिले थे। इसमें पॉजिटिव व्यक्ति के ठीक होने के बाद उसके रक्त को लेकर उसमें से प्लाज्मा लिया जाता है,प्लाज्मा को विकसित कर इससे बीमार लोगों का इलाज किया जाता है। इस विधि के परीक्षण की अनुमति मिल गई है। अगर यह विधि कारगर रहती है तो कोरोना से लड़ने का एक कारगर हथियार लोगों के हाथ मिल सकता है। इस समय पूरी दिल्ली को हॉटस्पॉट घोषित किया जा चुका है। दिल्ली के77इलाकों को कोरोना संक्रमण के लिहाज से कंटेन किया गया है। दिल्ली में इस समय कोरोना के1893पॉजिटिव केस हैं। कोरोना से संक्रमित42लोगों की मौत हो चुकी है जबकि72लोग स्वस्थ होकर अपने घरों को वापस जा चुके हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 19, 2020, 16:54 IST
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