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Kavi Krishna Mitra: वयोवृद्ध कवि कृष्ण मित्र के जाने के मायने, 'अधनंगा बचपन क्यों सोता, बस्ती के फुटपाथों में'

वे बेशक 91 साल के हो चुके थे, लंबे समय तक अस्पताल में रहे, लेकिन उनके भीतर का कवि आखिरी वक्त तक सांस लेता रहा। गाजियाबाद में ही वयोवृद्ध कवि कृष्ण मित्र ने अपना पूरा जीवन बिता दिया। देश उनकी कविताओं में धड़कता था। मौजूदा सियासी हालात से वह बहुत खुश नहीं थे, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी उनके हमेशा से आदर्श रहे। एक राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक शानदार कवि के रूप में वाजपेयी जी को कृष्ण मित्र हर वक्त अपने करीब पाते औऱ जब भी आप उनसे बात करते, तो ये ज़िक्र जरूर करते कि कैसे अटलबिहारी वाजपेयी ने ही उन्हें कृष्ण लाल से कृष्ण मित्र बना दिया। 2018 में अमर उजाला ने जब कृष्ण मित्र को अति वरिष्ठ नागरिक सम्मान देने की पेशकश की, उनका नज़रिया विस्तार से अखबार में छापा तो वह खासे उत्साहित हुए, अपनी बहुत सी बातें, यादें साझा कीं। वो किस्सा भी बताया कि कैसे वाजपेयी जी साठ के दशक में एक बार गाजियाबाद आए, उनकी कविताएं सुनीं और उन्हें मित्र नाम दे डाला। उस दौरान की तस्वीर भी उन्होंने दिखाई और साझा की। बहुत भावुक होकर कहा कि आज साहित्य में प्रयोग जरूर हो रहे हैं, लेकिन देशप्रेम का तत्व कहीं गुम हो गया है। दिनकर उनके प्रिय कवियों में थे और उनकी ओजपूर्ण कविताओं में कई बार वीर रस का वही संचार देखने को मिलता था। 15 अक्तूबर 1934 को जन्मे कृष्ण मित्र की प्रकाशित कृतियों पर एक नज़र डालें तो उनकी कविताओं का अंदाजा आपको शीर्षक से ही लग जाएगा – उनके कविता संग्रह जवानी जगा करती है, सुन इतिहास पुरुष, यह अपना हिंदुस्तान है क्या, परिवेश में रहते हुए और उनके मुक्तक संग्रह – रक्षा कवच ढीले हैं, महाभारत कब तक से लेकर डाकियों पर उनके तीन मुक्तक संग्रह। कवि सम्मेलनों के मंचों पर वह दशकों तक छाए रहे और करीब 16 सालों तक लगातार लालकिला की प्राचीर से कविता पाठ भी करते रहे। बेशक उनके रचनाकर्म में देश को लेकर उनकी चिंताएं बेहद गहरी रही हैं और आखिरी वक्त तक उनके भीतर यह बेचैनी बनी रही। वैचारिक धरातल पर आरएसएस के करीब रहे, अटल बिहारी वाजपेयी के दौर तक उनका चिंतन इसके प्रभाव में काफी रहा, लेकिन मौजूदा सत्ता को लेकर और उसकी कार्यशैली या सोच को लेकर वह बहुत खुश नहीं रहते थे। उनके भीतर लगातार वही विद्रोह और कई बार अपने देश की चिंताएं दिखती थीं। कुछ पंक्तियां देखिए – क्या होती हैं मर्यादाएं, क्या होती है नैतिकता संस्कारों की क्या परिभाषा, आदर्शों का किसे पता नियम उपनियम, न्याय व्यवस्था, है किसके आधीन यहां लोकतंत्र क्यों आतंकित है, पशुता क्यों स्वाधीन यहां राजभवन की पहरेदारी, सौंपी है किन हाथों में अधनंगा बचपन क्यों सोता, बस्ती के फुटपाथों में बेशक कृष्ण मित्र के जाने से साहित्य जगत आहत है। उम्र और सेहत पर किसी का अधिकार नहीं। उनके ही उम्र के जाने-माने कथाकार रा यात्री उन तमाम दिनों को याद करते हैं, जो उन्होंने कृष्ण मित्र के साथ गुजारे हैं। उनके निधन से बहुत आहत रा यात्री कहते हैं कि अध्यापक के तौर पर गाजियाबाद में नौकरी शुरू करने के शुरूआती दौर में गाजियाबाद के जिन साहित्यकारों से संपर्क हुआ उनमें कृष्ण मित्र सर्वोपरि थे। कृष्ण मित्र भारत-पाक विभाजन के बाद 1946 में गाजियाबाद आए थे। वह इस शहर के तमाम उतार-चढ़ाव और उपलब्धियों के साक्षी रहे। 60 के उस दौर में कस्बेनुमा इस शहर में गिनती के ही साहित्यकार हुआ करते थे। कोई साहित्यिक केंद्र न होने की वजह से कंपनी बाग या टाउन हॉल में ही साहित्यिक आयोजन होते थे। उस समय रामेश्वर उपाध्याय, अमरनाथ सरस, गोपाल कृष्ण कौल, हरप्रसाद शास्त्री जैसे साहित्यकारों ही शहर की साहित्यिक गरिमा बढ़ाते थे। वो कहते हैं कि मुझे यात्री उपनाम जहां उपेंद्रनाथ अश्क ने दिया। वहीं कृष्ण लाल जी को मित्र उपनाम अटल बिहारी वाजपेई जी ने दिया था। कृष्णमित्र की राष्ट्रीय चेतना अदभुत थी। बाबरी मस्जिद प्रकरण, विमान अपहरण, पोखरण परीक्षण और कारगिल युद्ध जैसे मौके पर चली उनकी लेखनी साहित्य ही नहीं राष्ट्रीय धरोहर के रूप में अपनी एक अलग पहचान रखती है। मौजूदा दौर के सक्रिय कवियों और साहित्यकारों के लिए भी कृष्णमित्र का जाना किसी सदमें से कम नहीं है। इनमें शायर गोविंद गुलशन, रमा सिंह, आलोक यात्री, चेतन आनंद, सुभाष चंदर, अनिमेष शर्मा, दीपाली जैन, रिंकल शर्मा, मनु लक्ष्मी मिश्रा, मतीन मेरठी सुरेंद्र सिंघल, योगेन्द्र दत्त शर्मा, विपिन जैन, सरवर हसन सरवर, जकी तारिक, सुशील शर्मा समेत तमाम लोग हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 24, 2022, 19:59 IST
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वे बेशक 91 साल के हो चुके थे, लंबे समय तक अस्पताल में रहे, लेकिन उनके भीतर का कवि आखिरी वक्त तक सांस लेता रहा। गाजियाबाद में ही वयोवृद्ध कवि कृष्ण मित्र ने अपना पूरा जीवन बिता दिया।