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पृथ्वी नित्य एक नया विचार है

इस बार साहित्य के नोबेल से सम्मानित अमेरिकी लेखिका लुइस ग्लुक का विचार है कि हम इस दुनिया को सिर्फ एक ही बार देखते हैं, फिर तो सिर्फ स्मृतियां ही होती हैं। यह विचार आकर्षक, दार्शनिक और युक्तिसंगत लगता है। दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति यही कहते रहे कि हम स्मृतियों और छवियों में एक दूसरे को देखते हैं, कि हम एक बच्चे की तरह किसी फूल को नहीं देखते, इस तरह कि मानो पहली बार देख रहे हों, बिना नाम के, बिना किसी पूर्व स्मृति के। बड़ा होता बच्चा पहली बार इस दुनिया को देखता है। उसके पास छवियां बनती जाती हैं और फिर उन्हीं छवियों को वह जीवन भर देख रहा होता है, दोहरा रहा होता है। निर्मल वर्मा कहते थे कि पुरस्कार से सिर्फ इतना ही होता है कि लेखक को जानने का दायरा बढ़ता है। तो क्या अब साहित्य और कला में मूल विचारों का अभाव हो चला है 20 वीं शती के लगभग उत्तरार्ध में इस वैचारिक संकट की आहट सावित्री और पैराडाइज लॉस्ट के प्रकाशन और प्रसिद्धि के बाद से ही मिलने लगी थी। इन दो अनुपम कृतियों के बाद लेखकीय प्रयोग पूरी दुनिया में होते ही रहे। जैसे भारत में रवींद्रनाथ के साहित्य प्रभाव से उबरने के लिए लेखकों की एक नई पौध सामने आई, ताकि एक दूसरे प्रकार के मौलिक साहित्य स्पर्श से लोग परिचित हो सकें, जैसे मानिक बंद्योपाध्याय, ताराशंकर बंद्योपाध्याय, प्रेमेंद्र मित्र, बुद्धदेव बसु, शीर्षेंदु मुखोपाध्याय आदि। भारत से बाहर 20 वीं शती में यानी चेखव और रिल्के के बाद कामू से लेकर बोर्खेज, मार्खेज, अचेबे, मॉरिसन और पामुक तक एक दूसरे प्रकार की उद्घाटित संवेदनशीलता को साहित्य में नियोजित करने की प्रक्रिया आरंभ हुई थी। कई लेखकों की सोच है कि साहित्य या कला रूपों में दर्शन या दार्शनिक विचार न हो। यदि दर्शन न हो, तो फिर क्या हो भारतीय परंपरा में ऋषियों को कवि कहा गया है। जिसके पास दृष्टि या अंतर्दृष्टि नहीं, उससे काव्य की अपेक्षा ही असंगत है। अपना वैभव बनाए रखने के लिए प्रकृति के निरंतर यज्ञ में मनुष्य का एकमात्र अवदान है कि वह इसे समझेऔर अपने सह अस्तित्व को विचार से साझा करता रहे। संभवतः इसी कारण पृथ्वी इन दिनों अपने ही मनुष्यऔर उसकी आदिम जिद से विरक्त है। पृथ्वी की प्रत्यंचा पर अब करुणा नहीं, क्रोध है। श्री अरविंद ने उस सावित्री की कहानी लिखी ही नहीं, जिसे हम महाभारत से जानते हैं। उन्होंने उस स्त्री के बारे में बताया, जिसके बारे में बताकर 21 वीं शती की स्त्री को उसका आत्मसम्मान लौटाया जा सकता है और यह भरोसा सौंपा जा सकता है कि उसके अपमानित इतिहास को अब दोहराया नहीं जायेगा। पौराणिक आख्यानों को नया स्वर देने की साधारण कोशिश भारतीय साहित्य में गिरीश कारनाड ने भी की है और मैत्रेयी देवी ने भी। चाहते तो ऐसी कोशिश दादा साहेब फाल्के भी कर सकते थे। वर्ष 1914 से 1917 तक जब वह राजा हरिश्चंद्र या कृष्ण लीला बना रहे थे, तब चार्ली चैप्लिन सिनेमा के प्रतिमान रच रहे थे। माध्यम का विकास सभी के लिए समान हुआ था। उस माध्यम का उपयोग एक रचनात्मक हृदय कैसे कर रहा था, यह देखना महत्वपूर्ण है। चार्ली ने उसी माध्यमगत सीमा में न सिर्फ एक कॉमन मैन का चरित्र सोचा, बल्कि उस चरित्र के जरिये वह अपने समय की दुरभिसंधियों और निरंकुश यथार्थ पर टिप्पणी करने का जोखिम भी उठाते रहे। ऐसे ही जिस दौर में ब्रेसां, बर्गमैन और तारकोव्स्की साहित्य निर्भर सिनेमा से मुक्ति पाने सिनेमैटोग्राफी की भाषा का सम्यक उपयोग करते हुए सिनेमा माध्यम का अपना साहित्य रच रहे थे, तब सत्यजित राय साहित्य आधारित सिनेमा को नया स्वर देकर विह्वल हो रहे थे। हम आज भी पथेर पांचाली को लेकर विह्वल हैं, जबकि बर्गमैन, ब्रेसां या तारकोव्स्की ने किसी भारतीय फिल्मकार का कभी नाम भी नहीं लिया। असली बात मूल विचार की है। पृथ्वी नित्य एक नया विचार है। वह अपना दोहराव नहीं देखना चाहती। जबकि आदिम भयग्रस्त चेतना पहले भी किसी रोग से मुक्त होने के टोटकों पर विश्वास करती थी, आज भी वह सोचती है कि अंधेरे में रोशनी करने या थाली बजाने से वह कोरोना से मुक्त हो जाएगा। सृष्टि के विकास क्रम में अभी तक मनुष्य मन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। दरअसल समूह चेतना का परिवर्तन किसी समाज सुधारक या महापुरुष पर निर्भर नहीं। जबकि प्रकृति चाहती है कि मनुष्य अपनी प्रकृति से ऊपर उठकर विराट प्रकृति के कार्य में सहयोग करे। इसके लिए यदि उसके पास कोई शाश्वत विचार भी है, तो पृथ्वी आज भी अनुरक्ता स्त्री की तरह अपने पुरुष का वरण करने को उत्सुक है। कविता और अन्य कला रूपों में ही ऐसा संभव है। मनुष्य को अपने अंध गह्वर से बाहर आना है, ताकि प्रकाश को उसका पूरा आकाश मिले, क्योंकि यह सूरज ही है, जिसने कभी अंधकार को नहीं देखा। जबकि हम हैं कि बार-बार ग्लुक के शब्दों में एक ही विचार को पढ़ते और बोलते हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 22, 2020, 02:45 IST
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