international

अब अपने ही नागरिकों की जासूसी कराएगा बाइडन प्रशासन? देसी आतंकवाद से है खतरा

जो बाइडन प्रशासन अमेरिकी नागरिकों की ऑनलाइन बातचीत की निगरानी करने की योजना बना रहा है। बताया जाता है कि अमेरिकियों की उग्रवादी बातचीत पर नजर रखने के लिए ये विचार सामने रखा गया है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि अगर प्रशासन इस रास्ते पर आगे बढ़ता है, तो इसे नागरिकों की जासूसी करना समझा जाएगा। टीवी चैनल सीएनएन की एक खबर के मुताबिक अमेरिका के आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय को बिना उचित कारण बताए नागरिकों की ऑनलाइन बातचीत की निगरानी का अधिकार नहीं है। कानूनन वह झूठी पहचान के जरिए निजी संदेशों के आदान-प्रदान में पैठ भी नहीं बना सकता। इसलिए फिलहाल सरकार प्राउट ब्वॉयज या ओथ कीपर्स जैसे उग्रवादी गुटों के सदस्यों की बातचीत की निगरानी सिर्फ ट्विटर और फेसबुक जैसे माध्यमों पर डाले गए संदेशों के आधार पर ही कर सकता है। इसीलिए अब बाहरी तत्वों की उन गुटों में बिचौलियों की पैठ करवा कर उनके बीच चल रही बातचीत की जानकारी हासिल करने को योजना बनाई गई है। गृह मंत्रालय की सोच है कि ऐसा करने से सरकार को ये मालूम हो सकेगा कि उग्रवादी गुटों में क्या ताजा सोच चल रही है। सीएनएन के मुताबिक इस योजना पर आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय के भीतर विचार-विमर्श चल रहा है। इस बारे में सीएनएन के सवाल पर मंत्रालय कहा कि वह संदिग्ध देसी आतंकवादियों की निगरानी के लिए प्राइवेट फर्म्स के साथ पार्टनरशिप नहीं कर रहा है। उसने इस आरोप को बिल्कुल झूठा बताया कि अपनी कानूनी सीमाओं को बेअसर करने के लिए वह बाहरी कंपनियों की मदद ले रहा है। मंत्रालय ने कहा कि देसी आतंकवाद के खतरे से निपटने के लिए उसके सारे कार्य संविधान और संबंधित कानून के मुताबिक हैं। इन कदमों को निजता और नागरिक अधिकार विशेषज्ञों से राय-मशविरा कर उठाया गया है। इस खंडन के बावजूद सीएनएन ने अपने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय उन बिचौलियों से भागीदारी करने पर विचार कर रहा है, जिनका सोशल मीडिया के क्षेत्र में ज्यादा दखल है। इस रिपोर्ट के मुताबिक अगर ऐसा असल में होता है, तो उससे आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय ऐसी सूचनाएं जुटा सकेगा, जो उसके और फेडरल इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (एफबीआई) दोनों के लिए उपयोगी होंगी। अमेरिकी कानून के मुताबिक एफबीआई बिना पहले से वारंट हासिल किए किसी अमेरिकी नागरिक की निगरानी नहीं कर सकती। सीआईए और नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के पास भी देश के अंदर खुफिया जानकारियां एकत्र करने के मामले में सीमित अधिकार ही हैं। पिछले साल अभी जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति थे, तब पोर्टलैंड दंगों के समय आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय ने पत्रकारों और नागरिकों के बारे में खुफिया जानकारी जुटाई थी। इस बात का खुलासा मंत्रालय की एक अंदरूनी रिपोर्ट से हुआ। अब आलोचकों ने सवाल उठाया है कि क्या बाइडन प्रशासन भी इस मामले में पूर्व ट्रंप प्रशासन की राह पर चलेगा सीएनएन के मुताबिक सीनेट के एक अधिकारी उससे कहा- एक तरफ बात आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय को इतना सशक्त बनाने की है, जिससे वह देसी आतंकवाद की खुफिया जानकारी हासिल कर सके। लेकिन पोर्टलैंड दंगों के समय जैसा दुरुपयोग हुआ, उसे देखते हुए कैपिटॉल हिल (संसद) में उसे नए अधिकारी और नई क्षमताएं देने को लेकर एक हिचक भी है। लेकिन सीएनएन के मुताबिक उसे अनेक सूत्रों ने बताया है कि आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय मौजूदा अधिकारियों और संसाधनों की सीमा के बीच ही ज्यादा खुफिया जानकारियां जुटाने की संभावना पर विचार कर रहा है। इस काम में उन शोधकर्ताओं की मदद लेने पर विचार किया जा रहा है, जो पहले से ऐसी ऑनलाइन गतिविधियों में शामिल हैं। ये लोग जानकारी हासिल करने के लिए बिचौलिये की भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए उन गैर-व्यावसायिक अनुसंधान कंपनियों और संगठनों की मदद ली जा सकती है, जो टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में गुपचुप पैठ बना कर किसी संगठन या संस्था की अंदरूनी बातचीत की जानकारी हासिल कर लेते हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 04, 2021, 15:20 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »

जो बाइडन प्रशासन अमेरिकी नागरिकों की ऑनलाइन बातचीत की निगरानी करने की योजना बना रहा है। बताया जाता है कि अमेरिकियों की उग्रवादी बातचीत पर नजर रखने के लिए ये विचार सामने रखा गया है।